


जब थैली में समा गई थी आदत,
प्लास्टिक बन गई जीवन की कीमत।
तब एक स्त्री ने उठाया झोला —
कहा, “अब नहीं, यह होगा आखिरी बोझ का गोला।”
🌱 वो थीं डॉ. अनुभा पुंडीर,
कहलातीं आज — झोला वुमन, पृथ्वी की पीर।
हर गली, हर मोड़ पर गईं वो,
थैली नहीं, अब झोला ही पहचान हो।
“झोला अभियान” एक विचार नहीं,
यह आंदोलन है — जिससे जागे धरती का नसीब कहीं।
UN के लक्ष्य हों या गूगल का डेटा,
हर लाइन कहे — प्लास्टिक अब नहीं सहता।
SDG 12 बोले — “उत्पादन में हो विवेक”,
SDG 13 चेताए — “जलवायु से न खेलो नेक।”
🌏 फिर झोला उठा भारत की बेटी ने,
कहा —
“मैं प्रकृति की पुजारी हूँ,
हर थैली से भारी हूँ।
मेरे झोले में है एक युग का परिवर्तन,
यह केवल वस्त्र नहीं, है धरती का जीवन।”
👣 हर छात्र को पढ़ाया – “Indian Knowledge System”,
“सस्टेनेबिलिटी” को बना दिया राष्ट्र धर्म।
बच्चों के हाथों में बीज बोए,
कपड़े के झोले में संस्कारों की रेखा जोड़े।
“जंगल भी बचे, जल भी बचे,
और आने वाली पीढ़ी भी मुस्कुराए।”
अब जरा सोचिए —
एक झोला कितना हल्का होता है,
पर जब डॉ. अनुभा के हाथ में हो,
तो वो धरती को संभालने वाला अभियान बन जाता है।
🔖 अभियान का नारा:
“ना प्लास्टिक, ना बहाना,
हर घर में झोला अब हो दिवाना।
झोला उठाओ, धरती बचाओ —
सस्टेनेबिलिटी को अपनाओ!”
